Thursday, August 19, 2010

हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो

हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो

हां ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …बस पता नहीं है …. है क्या वो ?
कभी बंद आलमारियों में ……तो कभी किताबों के पन्नों में
कभी बेड के नीचे ………तो कभी तह की हुई चादरों में
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो
बस पता नहीं है …… है क्या वो ?………
कभी रात के अंधेरो में तो कभी बरसते पानी के बूंदों में ,,,,,,,,,,,,
कभी ख़ुशी में तो कभी गम में,,,,,,,,,
हाँ दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..
बस पता नहीं है है क्या वो …?…….
कभी मोबाइल के मेसेज बॉक्स में तो कभी ताश के पत्तो में ……….
कभी अपनी यादो में तो कभी दुसरो की बातो में ……….
हाँ दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …….
कभी मंटो की कहानियों में तो कभी गुलज़ार की नज़्मो में
कभी रम की बोतलों में तो कभी सिगरेट की धुंवो में
बस दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …………
कभी समन्दर की लहरों में तो कभी तालाब के रुके पानी में ….
कभी एक हल्की सी आवाज में तो कभी एक हल्की सी रौशनी में …….
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …
कभी खंडहर बन गए मंदिर में तो कभी अकेले रास्तो में
कभी तारों में तो कभी चाँद की रौशनी में ……..
बस ढूंढ रहा हूँ कुछ तो ……….
कभी खाली पड़ी खिडकियों में ,
कभी पुराने न्यूज़ पेपर में तो कभी पुरानी चिठियो में
बस कुछ दूंढ़ रहा हूँ ,,,,,,,,,,जिसकी तलाश अभी भी जारी है ……
आज जिन्दगी में जिसे खोज रहा हूँ तो कल उसे मौत में खोज़ुंगा ………..
शायद दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..जिसका अभी तक पता नहीं है …………