आग की राख़
बुझी हुई आग की राख़ में ढूंढ रहा हूँ,
एक आग,
बुझ गई है आग,
फिर भी राख़ में हाथ डाले,
गर्म सोच के,
बैठा हूँ,
हाथ बढाता हूँ,
पर अब तो राख़ भी ठण्ड हो गई है,
दिमाग ये बात समझना नहीं चाहता,
और बार बार ये कह देता है,
थोड़ा और खोजो,
थोड़ा और खोजो,
अन्दर अभी कुछ गर्म होगा,
इस सिकुड़ती,
कड़कती ठण्ड में,
अब गर्म राख़ की खोज में,
हाथ अन्दर करते करते,
जमीं की ठंडक जब मिलने लगी ...
तो सोचता हूँ,
अगर ,
कँही गर्म राख़ मिल जाए तो दो मुठ्ठी खा लूँ,
कुछ देर शायद पेट में गर्म रह जाए ...