Wednesday, December 22, 2010
बिन मौसम बारिश के बाद की एक रात
Thursday, August 19, 2010
हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो
हां ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …बस पता नहीं है …. है क्या वो ?
कभी बंद आलमारियों में ……तो कभी किताबों के पन्नों में
कभी बेड के नीचे ………तो कभी तह की हुई चादरों में
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो
बस पता नहीं है …… है क्या वो ?………
कभी रात के अंधेरो में तो कभी बरसते पानी के बूंदों में ,,,,,,,,,,,,
कभी ख़ुशी में तो कभी गम में,,,,,,,,,
हाँ दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..
बस पता नहीं है है क्या वो …?…….
कभी मोबाइल के मेसेज बॉक्स में तो कभी ताश के पत्तो में ……….
कभी अपनी यादो में तो कभी दुसरो की बातो में ……….
हाँ दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …….
कभी मंटो की कहानियों में तो कभी गुलज़ार की नज़्मो में
कभी रम की बोतलों में तो कभी सिगरेट की धुंवो में
बस दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …………
कभी समन्दर की लहरों में तो कभी तालाब के रुके पानी में ….
कभी एक हल्की सी आवाज में तो कभी एक हल्की सी रौशनी में …….
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …
कभी खंडहर बन गए मंदिर में तो कभी अकेले रास्तो में
कभी तारों में तो कभी चाँद की रौशनी में ……..
बस ढूंढ रहा हूँ कुछ तो ……….
कभी खाली पड़ी खिडकियों में ,
कभी पुराने न्यूज़ पेपर में तो कभी पुरानी चिठियो में
बस कुछ दूंढ़ रहा हूँ ,,,,,,,,,,जिसकी तलाश अभी भी जारी है ……
आज जिन्दगी में जिसे खोज रहा हूँ तो कल उसे मौत में खोज़ुंगा ………..
शायद दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..जिसका अभी तक पता नहीं है …………
Thursday, February 25, 2010
होली
ये रंग भी क्या चीज़ है................
हाँ बड़े से ले के छोटे तक सब इसको साथ में खेलते हैं....
चलो कम से कम एक दिन तो साथ में रहते हैं......
आओ एस बार होली को जाने ना दें वापस....
कि अबकी आये तो हमारे घर में पेइंग गेस्ट कि तरह ही सही
कुछ और साल बिता के जाए..
एक मछुआरे से बात कि है मैंने उसके जाल के लिए ......
पर उसने बोला की उसके जाल में अब कुछ छेद हैं कमबख्त ...
अब क्या करूँ ? सोचता हूँ जा के एक बार बात करू गुलज़ार से..
उन्होंने बताया था की उनका एक यार जुलाहा है....
वो तो बिन गाठो के रिश्ते बुना करता है....
और ये तो सिर्फ एक जाल है कुछ कच्चे ख्यालात के...
आओ एस दफा कुछ ऐसा षड्यंत करें मिलके .....
कि अबकी आये तो फिर कभी वापस न जाने पाए.......
Wednesday, February 24, 2010
Ek adhura badlaw
एक अधुरा बदलाव
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अभी से बदला सा लगता है ये शमा
न जाने आगे क्या होगा ?
क्या खुद को बदल पाऊंगा मैं
या इस शमा में बदल जाऊंगा मैं |
दूर -दूर तक केवल बदलाव ही नज़र आता है ,
कुछ अपना था ये तो याद भी नहीं आता है |
एक दिलासे के लिए कहते हैं की ये हमारा था|
पर शायद हम उसके न हो सके जो हमारा था |
कुछ दूर क्या गए भूल चुके हैं खुद को
हमे ये तब पता चला जब हमने अपना पुराना आएना देखा |
एक बंद दरवाजे के पीछे मकड़ो देख के ये सोचा
हम दूर क्या गए अब तो अपना भी पराया हो गया ....
जो चीज़ थी हमारी वो किसी और का अपना हो गया ......
हम तो अपनी पूरी जिन्दगी भी यंहा न बिता सके
और देखो ! ये तो अपना आखरी बसंत मना रहे हैं|
कुछ और आगे बढ़ा तो अंधेरे वाले रास्ते से
पुरानी सीढ़ी का रास्ता याद आया
फिर वही मास्टर जी से डरकर छुप जाने का बहाना याद आया
अब बहूत पायेदान टूट चुके हैं उस सीढ़ी के
हाँ ! बात पुरानी हो गई
पर अपने ही रोते चेहरे को याद कर आज हसना आया .......
फिर भी क्न्यो अभी से बदला सा लगता है ये शमा न जाने आगे क्या होगा ......
पूरी दुनिया का रास्ता याद हो गया था
पर खुद के घर का रास्ता भूल गया था मैं
फिर क्न्यो न लगता ये बदलाव जिन्दगी में
जब सबके चेहरे याद थे और खुद को ही भूल गया था मैं
शायद यही बदलाव था जो बार -बार मुझसे ये पूछता है
क्न्यो अभी से बदला बदला सा लगता है ये शमा .......फिर न जाने आगे क्या होगा ........
पर शुक्र है उस आएने का जो आज भी मेरा पुराना चेहरा सम्हाल कर रखा है ..
और शुक्र है उस अँधेरे का जन्हा आज भी मेरा नटखट बचपन छुपा हुवा है ..
