Wednesday, February 24, 2010

Ek adhura badlaw

एक अधुरा बदलाव

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अभी से बदला सा लगता है ये शमा

न जाने आगे क्या होगा ?

क्या खुद को बदल पाऊंगा मैं

या इस शमा में बदल जाऊंगा मैं |

दूर -दूर तक केवल बदलाव ही नज़र आता है ,

कुछ अपना था ये तो याद भी नहीं आता है |

एक दिलासे के लिए कहते हैं की ये हमारा था|

पर शायद हम उसके न हो सके जो हमारा था |

कुछ दूर क्या गए भूल चुके हैं खुद को

हमे ये तब पता चला जब हमने अपना पुराना आएना देखा |

एक बंद दरवाजे के पीछे मकड़ो देख के ये सोचा

हम दूर क्या गए अब तो अपना भी पराया हो गया ....

जो चीज़ थी हमारी वो किसी और का अपना हो गया ......

हम तो अपनी पूरी जिन्दगी भी यंहा न बिता सके

और देखो ! ये तो अपना आखरी बसंत मना रहे हैं|

कुछ और आगे बढ़ा तो अंधेरे वाले रास्ते से

पुरानी सीढ़ी का रास्ता याद आया

फिर वही मास्टर जी से डरकर छुप जाने का बहाना याद आया

अब बहूत पायेदान टूट चुके हैं उस सीढ़ी के

हाँ ! बात पुरानी हो गई

पर अपने ही रोते चेहरे को याद कर आज हसना आया .......

फिर भी क्न्यो अभी से बदला सा लगता है ये शमा न जाने आगे क्या होगा ......

पूरी दुनिया का रास्ता याद हो गया था

पर खुद के घर का रास्ता भूल गया था मैं

फिर क्न्यो न लगता ये बदलाव जिन्दगी में

जब सबके चेहरे याद थे और खुद को ही भूल गया था मैं

शायद यही बदलाव था जो बार -बार मुझसे ये पूछता है

क्न्यो अभी से बदला बदला सा लगता है ये शमा .......फिर न जाने आगे क्या होगा ........

पर शुक्र है उस आएने का जो आज भी मेरा पुराना चेहरा सम्हाल कर रखा है ..

और शुक्र है उस अँधेरे का जन्हा आज भी मेरा नटखट बचपन छुपा हुवा है ..


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