Monday, December 12, 2011

आग की राख़


आग  की  राख़

बुझी  हुई  आग  की  राख़  में  ढूंढ  रहा  हूँ,  
एक  आग,
बुझ  गई  है  आग,
फिर  भी  राख़  में  हाथ  डाले,
गर्म  सोच  के,   
 बैठा  हूँ,
हाथ  बढाता  हूँ
पर  अब  तो  राख़  भी  ठण्ड  हो  गई  है,
दिमाग  ये  बात  समझना  नहीं  चाहता,
और  बार  बार  ये  कह देता है,
थोड़ा  और  खोजो,
थोड़ा  और  खोजो,
अन्दर  अभी  कुछ  गर्म  होगा,
इस सिकुड़ती,
कड़कती  ठण्ड  में,
अब  गर्म  राख़ की  खोज  में,
हाथ  अन्दर  करते  करते,
जमीं  की  ठंडक  जब  मिलने  लगी ...
तो  सोचता  हूँ,
अगर ,
कँही  गर्म  राख़  मिल  जाए  तो  दो  मुठ्ठी  खा  लूँ
कुछ  देर  शायद  पेट  में  गर्म  रह  जाए ...

Wednesday, November 30, 2011

मेरे वो खिलौने

मेरे  वो  खिलौने

मेरे  वो  खिलौने,  मेरे  वो  खिलौने,
कुछ  टूटे  कुछ  फूटे, मेरे  वो  खिलौने,

वो  मिट्ठू  वो  चिड़िया,
वो  भारी  से  मिट्टी  के  बूढे और  बुढ़िया,
वो  मिट्टी  की  मछली  और  मिट्टी  का  शेर,
वो  मिट्टी  की  बकरी  और  मिट्टी  का  भेड़,
सभी  मर  चुके  हैं, सभी  खो  चुके  हैं,
पर,  अब  वो सब, पुराने  से, धुल  में  लिपटे  हुए,
मेरे  किसी  दुछ्त्तिये  पे,  एक  कपड़े  के  झोले  में  पड़े  होंगे,
अब    वो  चल  पाते  हैं    दौड़  पाते  हैं,
गम्भीर  हो  गए  हैं  सब  के  सब,
समझदार  हो  गए  हैं  सब  के  सब,
बैठे  रहते  हैं  उस  पूराने  झोले  में, पर  कभी  जब  उस  दुछत्तिये  में  झाको  और  याद  करो  तो,
उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़......
क्या  जंगल मचा रहता  था  मेरे  आँगन  में,
वो बंदर  का  कूदना, वो  घोड़े  का  दौड़ना,
वो  खरगोश  का, शेर  को  मार  भागना,
वो  मछली  की  आवाजें ,
वो  मिट्ठू  की पप्पी,
वो  बिल्ली  को  टूटे  बिस्कुट  खिलाना,
तब वो सब चलते  थे, सब बोलते  थे, सब  हँसते भी थे,
पर  वो  सब  कुछ, अब  बंद  रह  गया  है  उस  झोले  में,
नहीं  तो, अब  वो  कैसे  खरगोश  को शेर से जीताऊं,
अब  कैसे  मछली  की  आवाजें  निकालूँ,  
वो  सब  तो  अब  बेवकूफी  लगती  है,
नहीं  तो  किसने  मछली  की  आवाजें  सुनी थी,
और कौन सी  बिल्ली  ने  बातें  करी थी,
तब  वो  सब कुछ  सही  लगता  था,
एक  दुनिया  जो  अपनी  बसाई  हुई  थी,
एक महफ़िल जो अपनी सजाई हुई थी,
इन  समझदारो  की  दुनिया  में  क्यों  रह  रहा  हूँ,
अब  सोचो  तो  लगता  है  की, वो  तो  बचपन  था,
याद  करो  तो  खुद  पे  हँसी आती  है,
पर  कँही    कँही,  आज  उस  दुछत्तिये  पे  बैठा,
मुझे  देख, बचपन  हँसता  ही  होगा|

Tuesday, May 31, 2011

परछाईं

मैं ढूँढता हूँ उसे और वो हमेशा मेरे साथ रहती है
लोग कहते है मुंबई में आप बहूत अकेले हो जाते हैं
पर मैं जब भी चलता हूँ अकेले सुने रास्तो पर
वो मेरे साथ कदम से कदम मिला के चलती है
पीछे वाली रोड लाइट से वो लम्बी होती जाती है और फिर कँही गुम हो जाती है .....
मैं ढूँढता हूँ बेवजह ही इधर उधर परेशां हो के .......
पर जब अपने बगल में देखता हूँ तो छोटी सी वो
आगे वाली रोड लाइट से फिर से बन जाती है
और मेरे साथ चलने लगती है ...............
ऐसे ही चाँद वाली रात में जब मैं अकेला अपनी खिड़की पे बैठता हूँ .......
तो वो भी मेरे पीठ से पीठ लगा के बैठी रहती है ... चुपचाप
चारो तरफ एक सन्नाटा सा रहता है ........
ये सन्नाटा अच्छा लग रहा है .......
कुछ उस से बोलना चाहता हूँ
पर डर है की .....ये ख़ामोशी खतम न हो जाए ........
और उसे ख़ामोशी जो पसंद है ...
बस यूँ ही चुपचाप हम दोनों बैठे रहते हैं...
पीठ से पीठ लगाए ........

Tuesday, February 22, 2011

चिठ्ठी

उस आधी चिठ्ठी में तुमने ऐसा क्या लिखा था

जो अभी भी तुमने सम्भाल के रखा है . ....

रोज़ उठा के उसे पढ़ती हो, आँख से छूती हो ...

और फिर से उसे अपनी तकिये के नीचे रख देती हो ...

उस तकिये पे मेरा नाम बड़ा अच्छा काढ़ा है तुमने ...

जब तुम तकिये पे सर रख के सो जाती .....

और मैं तुम्हारे ख्यालों में अपनी साइकिल से आता ....

खाली रास्तों पे जब हम दूर तक जाते और जब कभी थक जाते .....

तो किसी कुंवे के पास बैठ के अपनी परछाईयाँ देखा करते ....

सुबह में जब कोई साइकिल ले के आता और तुम्हारी नींद खुल जाती

तो तुम्हे ऐसा क्यों लगता की मैं आया हूँ ....

सच बोलो वो सपना तुमने भी देखा क्या ?...

फिर उठ के ये देख लेती की चिठ्ठी तो वँही है ना ...

शब्द गीनती लाइनों की ,कि कुछ कम तो नहीं हुवे हैं ....

उस आधी चिठ्ठी में अब कुछ और लिखो ...

कुछ उल्टी सीधी बात कहो ...

कुछ भूली बिसरी बात कहो ...

कुछ मीठे पल , कुछ कड़वे पल ...

जब हम साथ बैठ के मुन्गफलियाँ खाया करते थे ...

और मैं तुम्हे किस्से कह के, कहानियाँ सुनाया करता था ......

और तुम अजीब से एक्सप्रेसन के साथ सुना करती थी ....

वो सब मनगढ़न थी .... मैं तब भी फ़िक्सन कहता था ...

अभी भी फ़िक्सन लिखता हूँ ....

मेरी कलम झूट लिख के पैसे कमाती है ....

पर तुम तो सच कहती थी ...सच लिखती थी ...

तो आज फिर से लिखो ...वो दिन जब मैं झूट लिखा करता था ..

तुम्हारी कलम कि दवात सूख तो नहीं गई ....

मैंने पानी गरम किया है लाओ अपनी श्याही बनाये पक्की वाली ....

फिर आओ मेरे पास वो चिठ्ठी ले के कभी ...

फिर कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखे ...

और उस आधी चिठ्ठी में कुछ और सफ़े जोड़े .....