मेरे वो
खिलौने
मेरे वो खिलौने, मेरे वो खिलौने,
कुछ टूटे कुछ फूटे, मेरे वो खिलौने,
वो मिट्ठू वो चिड़िया,
वो भारी से मिट्टी के बूढे और बुढ़िया,
वो मिट्टी की मछली और मिट्टी का शेर,
वो मिट्टी की बकरी और मिट्टी का भेड़,
सभी मर चुके हैं, सभी खो चुके हैं,
पर, अब वो सब, पुराने से, धुल में लिपटे हुए,
मेरे किसी दुछ्त्तिये पे, एक कपड़े के झोले में पड़े होंगे,
अब न वो चल पाते हैं न दौड़ पाते हैं,
गम्भीर हो गए हैं सब के सब,
समझदार हो गए हैं सब के सब,
बैठे रहते हैं उस पूराने झोले में, पर कभी जब उस दुछत्तिये में झाको और याद करो तो,
उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़......
क्या जंगल मचा रहता था मेरे आँगन में,
वो बंदर का कूदना, वो घोड़े का दौड़ना,
वो खरगोश का, शेर को मार भागना,
वो मछली की आवाजें ,
वो मिट्ठू की पप्पी,
वो बिल्ली को टूटे बिस्कुट खिलाना,
तब वो सब चलते थे, सब बोलते थे, सब हँसते भी थे,
पर वो सब कुछ, अब बंद रह गया है उस झोले में,
नहीं तो, अब वो कैसे खरगोश को शेर से जीताऊं,
अब कैसे मछली की आवाजें निकालूँ,
वो सब तो अब बेवकूफी लगती है,
नहीं तो किसने मछली की आवाजें सुनी थी,
और कौन सी बिल्ली ने बातें करी थी,
तब वो सब कुछ सही लगता था,
एक दुनिया जो अपनी बसाई हुई थी,
एक महफ़िल जो अपनी सजाई हुई थी,
इन समझदारो की दुनिया में क्यों रह रहा हूँ,
अब सोचो तो लगता है की, वो तो बचपन था,
याद करो तो खुद पे हँसी आती है,
पर कँही न कँही, आज उस दुछत्तिये पे बैठा,
मुझे देख, बचपन हँसता ही होगा|

No comments:
Post a Comment