Wednesday, November 30, 2011

मेरे वो खिलौने

मेरे  वो  खिलौने

मेरे  वो  खिलौने,  मेरे  वो  खिलौने,
कुछ  टूटे  कुछ  फूटे, मेरे  वो  खिलौने,

वो  मिट्ठू  वो  चिड़िया,
वो  भारी  से  मिट्टी  के  बूढे और  बुढ़िया,
वो  मिट्टी  की  मछली  और  मिट्टी  का  शेर,
वो  मिट्टी  की  बकरी  और  मिट्टी  का  भेड़,
सभी  मर  चुके  हैं, सभी  खो  चुके  हैं,
पर,  अब  वो सब, पुराने  से, धुल  में  लिपटे  हुए,
मेरे  किसी  दुछ्त्तिये  पे,  एक  कपड़े  के  झोले  में  पड़े  होंगे,
अब    वो  चल  पाते  हैं    दौड़  पाते  हैं,
गम्भीर  हो  गए  हैं  सब  के  सब,
समझदार  हो  गए  हैं  सब  के  सब,
बैठे  रहते  हैं  उस  पूराने  झोले  में, पर  कभी  जब  उस  दुछत्तिये  में  झाको  और  याद  करो  तो,
उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़......
क्या  जंगल मचा रहता  था  मेरे  आँगन  में,
वो बंदर  का  कूदना, वो  घोड़े  का  दौड़ना,
वो  खरगोश  का, शेर  को  मार  भागना,
वो  मछली  की  आवाजें ,
वो  मिट्ठू  की पप्पी,
वो  बिल्ली  को  टूटे  बिस्कुट  खिलाना,
तब वो सब चलते  थे, सब बोलते  थे, सब  हँसते भी थे,
पर  वो  सब  कुछ, अब  बंद  रह  गया  है  उस  झोले  में,
नहीं  तो, अब  वो  कैसे  खरगोश  को शेर से जीताऊं,
अब  कैसे  मछली  की  आवाजें  निकालूँ,  
वो  सब  तो  अब  बेवकूफी  लगती  है,
नहीं  तो  किसने  मछली  की  आवाजें  सुनी थी,
और कौन सी  बिल्ली  ने  बातें  करी थी,
तब  वो  सब कुछ  सही  लगता  था,
एक  दुनिया  जो  अपनी  बसाई  हुई  थी,
एक महफ़िल जो अपनी सजाई हुई थी,
इन  समझदारो  की  दुनिया  में  क्यों  रह  रहा  हूँ,
अब  सोचो  तो  लगता  है  की, वो  तो  बचपन  था,
याद  करो  तो  खुद  पे  हँसी आती  है,
पर  कँही    कँही,  आज  उस  दुछत्तिये  पे  बैठा,
मुझे  देख, बचपन  हँसता  ही  होगा|

Tuesday, May 31, 2011

परछाईं

मैं ढूँढता हूँ उसे और वो हमेशा मेरे साथ रहती है
लोग कहते है मुंबई में आप बहूत अकेले हो जाते हैं
पर मैं जब भी चलता हूँ अकेले सुने रास्तो पर
वो मेरे साथ कदम से कदम मिला के चलती है
पीछे वाली रोड लाइट से वो लम्बी होती जाती है और फिर कँही गुम हो जाती है .....
मैं ढूँढता हूँ बेवजह ही इधर उधर परेशां हो के .......
पर जब अपने बगल में देखता हूँ तो छोटी सी वो
आगे वाली रोड लाइट से फिर से बन जाती है
और मेरे साथ चलने लगती है ...............
ऐसे ही चाँद वाली रात में जब मैं अकेला अपनी खिड़की पे बैठता हूँ .......
तो वो भी मेरे पीठ से पीठ लगा के बैठी रहती है ... चुपचाप
चारो तरफ एक सन्नाटा सा रहता है ........
ये सन्नाटा अच्छा लग रहा है .......
कुछ उस से बोलना चाहता हूँ
पर डर है की .....ये ख़ामोशी खतम न हो जाए ........
और उसे ख़ामोशी जो पसंद है ...
बस यूँ ही चुपचाप हम दोनों बैठे रहते हैं...
पीठ से पीठ लगाए ........

Tuesday, February 22, 2011

चिठ्ठी

उस आधी चिठ्ठी में तुमने ऐसा क्या लिखा था

जो अभी भी तुमने सम्भाल के रखा है . ....

रोज़ उठा के उसे पढ़ती हो, आँख से छूती हो ...

और फिर से उसे अपनी तकिये के नीचे रख देती हो ...

उस तकिये पे मेरा नाम बड़ा अच्छा काढ़ा है तुमने ...

जब तुम तकिये पे सर रख के सो जाती .....

और मैं तुम्हारे ख्यालों में अपनी साइकिल से आता ....

खाली रास्तों पे जब हम दूर तक जाते और जब कभी थक जाते .....

तो किसी कुंवे के पास बैठ के अपनी परछाईयाँ देखा करते ....

सुबह में जब कोई साइकिल ले के आता और तुम्हारी नींद खुल जाती

तो तुम्हे ऐसा क्यों लगता की मैं आया हूँ ....

सच बोलो वो सपना तुमने भी देखा क्या ?...

फिर उठ के ये देख लेती की चिठ्ठी तो वँही है ना ...

शब्द गीनती लाइनों की ,कि कुछ कम तो नहीं हुवे हैं ....

उस आधी चिठ्ठी में अब कुछ और लिखो ...

कुछ उल्टी सीधी बात कहो ...

कुछ भूली बिसरी बात कहो ...

कुछ मीठे पल , कुछ कड़वे पल ...

जब हम साथ बैठ के मुन्गफलियाँ खाया करते थे ...

और मैं तुम्हे किस्से कह के, कहानियाँ सुनाया करता था ......

और तुम अजीब से एक्सप्रेसन के साथ सुना करती थी ....

वो सब मनगढ़न थी .... मैं तब भी फ़िक्सन कहता था ...

अभी भी फ़िक्सन लिखता हूँ ....

मेरी कलम झूट लिख के पैसे कमाती है ....

पर तुम तो सच कहती थी ...सच लिखती थी ...

तो आज फिर से लिखो ...वो दिन जब मैं झूट लिखा करता था ..

तुम्हारी कलम कि दवात सूख तो नहीं गई ....

मैंने पानी गरम किया है लाओ अपनी श्याही बनाये पक्की वाली ....

फिर आओ मेरे पास वो चिठ्ठी ले के कभी ...

फिर कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखे ...

और उस आधी चिठ्ठी में कुछ और सफ़े जोड़े .....

Tuesday, February 1, 2011

चली है एक नाव

चली है एक नाव
कुछ ख्वाबों को सर पे लेके
दाम लिए हैं सबसे
और एक वादा किया है
उस पार पँहुचाने का
रास्ते में कंही कोई रोडब्रेकर नहीं
फिर भी नाव उछलती है हिलती है ...
रास्ते चलते हैं साथ-साथ
रास्ते में मिलते गए कुछ उड़ते पंछी
ख्वाब उनके भी थे उनके परों पर
और दूर तक सिर्फ धुन्ध और समन्दर था ख्वाबों का
फिर ख्वाबों ने ख्वाबों से बात किये .....
बहूत देर हो गई ख्वाबों के लहरों में .
अब भूख लगी है ख्वाबों को ...
सुना है उस पार एक रेस्टोरेंट है ख्वाबों का
ख्वाब खाएंगे ख्वाब पियेंगे
जब ख्वाबों से ख्वाब मिलेंगे
कुछ हकीक़त के लहरों पे
चली है एक नाव
कुछ ख्वाबों को सर पे लेके

Wednesday, December 22, 2010

बिन मौसम बारिश के बाद की एक रात

बिन मौसम बारिश के बाद की एक रात
ओह क्या सुहानी होती है
जैसे कभी जब सोचा भी ना हो और घर से मनी आर्डर आ जाये
कुछ ऐसा ही कर गई आज की ये बिन मौसम की बरसात

टिप-टिप करते देर तक पानी की बुँदे
जो अभी तक एक एहसास दिलाती है की यंहा हुई है आज एक बरसात
धुले हुवे सड़क भींगी हुवी मिट्टी से निकलने वाली वो महक
तो कभी पेड़ का अपने पत्तों पे रुके हुवे पानी का गिराना
कुछ ऐसा लगता है जैसे सिगरेट पीते,बात करते धीरे-२ कोई राख़ झाड़ रहा है

और स्ट्रीट लाइट में वो चमकती हुवी सीमेंटेड सड़क
ऐसा लगता है किसी ने महंगे वाले रंग से एक कैनवस रंगा है ....
और सारा पैसा खर्च कर दिया है एक सड़क की पेंटिंग में ...
तेज़ दौड़ती गाडियों की , रुके हुवे पानी को चीर के आगे बढ़ने की वो झंन्न्न सी आवाज .......
सब कुछ कभी कभी अच्छा लगता है
जब ऐसे ही कोई बिन मौसम के बरसात होती है
शायद यही वजह है की आज बिन मौसम के इस बरसात में मुम्बई भी अच्छा लगता है ........

Thursday, August 19, 2010

हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो

हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो

हां ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …बस पता नहीं है …. है क्या वो ?
कभी बंद आलमारियों में ……तो कभी किताबों के पन्नों में
कभी बेड के नीचे ………तो कभी तह की हुई चादरों में
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो
बस पता नहीं है …… है क्या वो ?………
कभी रात के अंधेरो में तो कभी बरसते पानी के बूंदों में ,,,,,,,,,,,,
कभी ख़ुशी में तो कभी गम में,,,,,,,,,
हाँ दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..
बस पता नहीं है है क्या वो …?…….
कभी मोबाइल के मेसेज बॉक्स में तो कभी ताश के पत्तो में ……….
कभी अपनी यादो में तो कभी दुसरो की बातो में ……….
हाँ दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …….
कभी मंटो की कहानियों में तो कभी गुलज़ार की नज़्मो में
कभी रम की बोतलों में तो कभी सिगरेट की धुंवो में
बस दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …………
कभी समन्दर की लहरों में तो कभी तालाब के रुके पानी में ….
कभी एक हल्की सी आवाज में तो कभी एक हल्की सी रौशनी में …….
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …
कभी खंडहर बन गए मंदिर में तो कभी अकेले रास्तो में
कभी तारों में तो कभी चाँद की रौशनी में ……..
बस ढूंढ रहा हूँ कुछ तो ……….
कभी खाली पड़ी खिडकियों में ,
कभी पुराने न्यूज़ पेपर में तो कभी पुरानी चिठियो में
बस कुछ दूंढ़ रहा हूँ ,,,,,,,,,,जिसकी तलाश अभी भी जारी है ……
आज जिन्दगी में जिसे खोज रहा हूँ तो कल उसे मौत में खोज़ुंगा ………..
शायद दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..जिसका अभी तक पता नहीं है …………