Tuesday, May 31, 2011
परछाईं
Tuesday, February 22, 2011
चिठ्ठी
उस आधी चिठ्ठी में तुमने ऐसा क्या लिखा था
जो अभी भी तुमने सम्भाल के रखा है . ....
रोज़ उठा के उसे पढ़ती हो, आँख से छूती हो ...
और फिर से उसे अपनी तकिये के नीचे रख देती हो ...
उस तकिये पे मेरा नाम बड़ा अच्छा काढ़ा है तुमने ...
जब तुम तकिये पे सर रख के सो जाती .....
और मैं तुम्हारे ख्यालों में अपनी साइकिल से आता ....
खाली रास्तों पे जब हम दूर तक जाते और जब कभी थक जाते .....
तो किसी कुंवे के पास बैठ के अपनी परछाईयाँ देखा करते ....
सुबह में जब कोई साइकिल ले के आता और तुम्हारी नींद खुल जाती
तो तुम्हे ऐसा क्यों लगता की मैं आया हूँ ....
सच बोलो वो सपना तुमने भी देखा क्या ?...
फिर उठ के ये देख लेती की चिठ्ठी तो वँही है ना ...
शब्द गीनती लाइनों की ,कि कुछ कम तो नहीं हुवे हैं ....
उस आधी चिठ्ठी में अब कुछ और लिखो ...
कुछ उल्टी सीधी बात कहो ...
कुछ भूली बिसरी बात कहो ...
कुछ मीठे पल , कुछ कड़वे पल ...
जब हम साथ बैठ के मुन्गफलियाँ खाया करते थे ...
और मैं तुम्हे किस्से कह के, कहानियाँ सुनाया करता था ......
और तुम अजीब से एक्सप्रेसन के साथ सुना करती थी ....
वो सब मनगढ़न थी .... मैं तब भी फ़िक्सन कहता था ...
अभी भी फ़िक्सन लिखता हूँ ....
मेरी कलम झूट लिख के पैसे कमाती है ....
पर तुम तो सच कहती थी ...सच लिखती थी ...
तो आज फिर से लिखो ...वो दिन जब मैं झूट लिखा करता था ..
तुम्हारी कलम कि दवात सूख तो नहीं गई ....
मैंने पानी गरम किया है लाओ अपनी श्याही बनाये पक्की वाली ....
फिर आओ मेरे पास वो चिठ्ठी ले के कभी ...
फिर कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखे ...
और उस आधी चिठ्ठी में कुछ और सफ़े जोड़े .....
Tuesday, February 1, 2011
चली है एक नाव
Wednesday, December 22, 2010
बिन मौसम बारिश के बाद की एक रात
Thursday, August 19, 2010
हाँ ढूंढ रहा हूँ कुछ तो
हां ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …बस पता नहीं है …. है क्या वो ?
कभी बंद आलमारियों में ……तो कभी किताबों के पन्नों में
कभी बेड के नीचे ………तो कभी तह की हुई चादरों में
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो
बस पता नहीं है …… है क्या वो ?………
कभी रात के अंधेरो में तो कभी बरसते पानी के बूंदों में ,,,,,,,,,,,,
कभी ख़ुशी में तो कभी गम में,,,,,,,,,
हाँ दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..
बस पता नहीं है है क्या वो …?…….
कभी मोबाइल के मेसेज बॉक्स में तो कभी ताश के पत्तो में ……….
कभी अपनी यादो में तो कभी दुसरो की बातो में ……….
हाँ दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …….
कभी मंटो की कहानियों में तो कभी गुलज़ार की नज़्मो में
कभी रम की बोतलों में तो कभी सिगरेट की धुंवो में
बस दूंढ़ रहा हूँ उसको जिसका अभी तक पता नहीं है …………
कभी समन्दर की लहरों में तो कभी तालाब के रुके पानी में ….
कभी एक हल्की सी आवाज में तो कभी एक हल्की सी रौशनी में …….
हाँ ढूंढ रहा हूँ शायद कुछ तो …
कभी खंडहर बन गए मंदिर में तो कभी अकेले रास्तो में
कभी तारों में तो कभी चाँद की रौशनी में ……..
बस ढूंढ रहा हूँ कुछ तो ……….
कभी खाली पड़ी खिडकियों में ,
कभी पुराने न्यूज़ पेपर में तो कभी पुरानी चिठियो में
बस कुछ दूंढ़ रहा हूँ ,,,,,,,,,,जिसकी तलाश अभी भी जारी है ……
आज जिन्दगी में जिसे खोज रहा हूँ तो कल उसे मौत में खोज़ुंगा ………..
शायद दूंढ़ रहा हूँ कुछ तो ……..जिसका अभी तक पता नहीं है …………
Thursday, February 25, 2010
होली
ये रंग भी क्या चीज़ है................
हाँ बड़े से ले के छोटे तक सब इसको साथ में खेलते हैं....
चलो कम से कम एक दिन तो साथ में रहते हैं......
आओ एस बार होली को जाने ना दें वापस....
कि अबकी आये तो हमारे घर में पेइंग गेस्ट कि तरह ही सही
कुछ और साल बिता के जाए..
एक मछुआरे से बात कि है मैंने उसके जाल के लिए ......
पर उसने बोला की उसके जाल में अब कुछ छेद हैं कमबख्त ...
अब क्या करूँ ? सोचता हूँ जा के एक बार बात करू गुलज़ार से..
उन्होंने बताया था की उनका एक यार जुलाहा है....
वो तो बिन गाठो के रिश्ते बुना करता है....
और ये तो सिर्फ एक जाल है कुछ कच्चे ख्यालात के...
आओ एस दफा कुछ ऐसा षड्यंत करें मिलके .....
कि अबकी आये तो फिर कभी वापस न जाने पाए.......
Wednesday, February 24, 2010
Ek adhura badlaw
एक अधुरा बदलाव
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अभी से बदला सा लगता है ये शमा
न जाने आगे क्या होगा ?
क्या खुद को बदल पाऊंगा मैं
या इस शमा में बदल जाऊंगा मैं |
दूर -दूर तक केवल बदलाव ही नज़र आता है ,
कुछ अपना था ये तो याद भी नहीं आता है |
एक दिलासे के लिए कहते हैं की ये हमारा था|
पर शायद हम उसके न हो सके जो हमारा था |
कुछ दूर क्या गए भूल चुके हैं खुद को
हमे ये तब पता चला जब हमने अपना पुराना आएना देखा |
एक बंद दरवाजे के पीछे मकड़ो देख के ये सोचा
हम दूर क्या गए अब तो अपना भी पराया हो गया ....
जो चीज़ थी हमारी वो किसी और का अपना हो गया ......
हम तो अपनी पूरी जिन्दगी भी यंहा न बिता सके
और देखो ! ये तो अपना आखरी बसंत मना रहे हैं|
कुछ और आगे बढ़ा तो अंधेरे वाले रास्ते से
पुरानी सीढ़ी का रास्ता याद आया
फिर वही मास्टर जी से डरकर छुप जाने का बहाना याद आया
अब बहूत पायेदान टूट चुके हैं उस सीढ़ी के
हाँ ! बात पुरानी हो गई
पर अपने ही रोते चेहरे को याद कर आज हसना आया .......
फिर भी क्न्यो अभी से बदला सा लगता है ये शमा न जाने आगे क्या होगा ......
पूरी दुनिया का रास्ता याद हो गया था
पर खुद के घर का रास्ता भूल गया था मैं
फिर क्न्यो न लगता ये बदलाव जिन्दगी में
जब सबके चेहरे याद थे और खुद को ही भूल गया था मैं
शायद यही बदलाव था जो बार -बार मुझसे ये पूछता है
क्न्यो अभी से बदला बदला सा लगता है ये शमा .......फिर न जाने आगे क्या होगा ........
पर शुक्र है उस आएने का जो आज भी मेरा पुराना चेहरा सम्हाल कर रखा है ..
और शुक्र है उस अँधेरे का जन्हा आज भी मेरा नटखट बचपन छुपा हुवा है ..
