Tuesday, May 31, 2011

परछाईं

मैं ढूँढता हूँ उसे और वो हमेशा मेरे साथ रहती है
लोग कहते है मुंबई में आप बहूत अकेले हो जाते हैं
पर मैं जब भी चलता हूँ अकेले सुने रास्तो पर
वो मेरे साथ कदम से कदम मिला के चलती है
पीछे वाली रोड लाइट से वो लम्बी होती जाती है और फिर कँही गुम हो जाती है .....
मैं ढूँढता हूँ बेवजह ही इधर उधर परेशां हो के .......
पर जब अपने बगल में देखता हूँ तो छोटी सी वो
आगे वाली रोड लाइट से फिर से बन जाती है
और मेरे साथ चलने लगती है ...............
ऐसे ही चाँद वाली रात में जब मैं अकेला अपनी खिड़की पे बैठता हूँ .......
तो वो भी मेरे पीठ से पीठ लगा के बैठी रहती है ... चुपचाप
चारो तरफ एक सन्नाटा सा रहता है ........
ये सन्नाटा अच्छा लग रहा है .......
कुछ उस से बोलना चाहता हूँ
पर डर है की .....ये ख़ामोशी खतम न हो जाए ........
और उसे ख़ामोशी जो पसंद है ...
बस यूँ ही चुपचाप हम दोनों बैठे रहते हैं...
पीठ से पीठ लगाए ........

1 comment:

  1. परछाईं ऐसी ही होती है - शुभकामनाएं

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