मैं ढूँढता हूँ उसे और वो हमेशा मेरे साथ रहती है
लोग कहते है मुंबई में आप बहूत अकेले हो जाते हैं
पर मैं जब भी चलता हूँ अकेले सुने रास्तो पर
वो मेरे साथ कदम से कदम मिला के चलती है
पीछे वाली रोड लाइट से वो लम्बी होती जाती है और फिर कँही गुम हो जाती है .....
मैं ढूँढता हूँ बेवजह ही इधर उधर परेशां हो के .......
पर जब अपने बगल में देखता हूँ तो छोटी सी वो
आगे वाली रोड लाइट से फिर से बन जाती है
और मेरे साथ चलने लगती है ...............
ऐसे ही चाँद वाली रात में जब मैं अकेला अपनी खिड़की पे बैठता हूँ .......
तो वो भी मेरे पीठ से पीठ लगा के बैठी रहती है ... चुपचाप
चारो तरफ एक सन्नाटा सा रहता है ........
ये सन्नाटा अच्छा लग रहा है .......
कुछ उस से बोलना चाहता हूँ
पर डर है की .....ये ख़ामोशी खतम न हो जाए ........
और उसे ख़ामोशी जो पसंद है ...
बस यूँ ही चुपचाप हम दोनों बैठे रहते हैं...
पीठ से पीठ लगाए ........

परछाईं ऐसी ही होती है - शुभकामनाएं
ReplyDelete